ग्राउंड रिपोर्ट- सरकार की अनदेखी से ज़हरीला आर्सेनिक ले रहा लोगों की जान

बलिया– करीब 35 लाख की आबादी वाला बलिया ज़िला ज़हरीले आर्सेनिक की चपेट में है। पेयजल में आर्सेनिक की अधिक मात्रा होने से यहां के लोगों का जीवन संकट में आ गया है।

पीने के पानी में आर्सेनिक की अधिक मात्रा होने से चित्तीदार धब्बे, हथेली का खुरदुरा और कड़ा होना, घाव होना आदि के साथ ही त्वचा कैंसर से लेकर शरीर के विभिन्न अंगों में कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां हो रही हैं।
बलिया में हजारों की आबादी हर साल आर्सेनिक जनित कैंसर आर्सिनोकोसिस से मर रही है।
आर्सेनिक से होने वाली बीमारी से जूझ रहे बलिया के रहने वाले बजरंगी ने न्यूज़ सेंट्रल से बातचीत में बताया कि उसका पूरा घर ज़हरीले आर्सेनिक की चपेट में है।

उसने बताया कि उसका एक बेटा पिछले साल ही आर्सेनिक युक्त दूषित पानी पीने से मर गया और दूसरा बेटा बीमार है।
बजरंगी ने पीले पानी को दिखाया और ग़ुस्से में पूछा, “क्या हम साफ़ पानी के लायक भी नहीं हैं?”
इससे पहले इस मुद्दे पर 2015 में इंडिया टुडे ने भी विस्तृत रिपोर्ट की थी। इंडिया टुडे से बात करते हुए आर्सेनिक पीड़ितों के लिए काम कर रहे गैर-सरकारी संगठन इनर वॉयस के संयोजक सौरभ सिंह ने प्रशासन की लापरवाही को उजागर किया था।

उन्होंने बताया था कि, ”आर्सेनिक पीड़ितों की नियमित स्वास्थ्य जांच का भी कोई बंदोबस्त नज़र नहीं आता। आर्सेनिक जागरूकता कार्यक्रम के लिए जारी रकम का क्या इस्तेमाल हुआ इसका भी किसी को पता नहीं है।”

उन्होंने कहा कि इस बारे में वे राज्य और केन्द्र सरकार के स्तर पर सवाल उठाते रहे हैं, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला जबकि आर्सेनिक का स्तर दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है।
जब इस मामले की शिकायत केन्द्रीय ग्रामीण विकास मन्त्रालय से की गई तो मामले की जाँच करने के लिए नेशनल लेवल मॉनीटर (एनएलएम) के विशेषज्ञ दल को यहां भेजा गया। एनएलएम की रिपोर्ट ने यहाँ बड़े पैमाने पर अनियमितताओं की बात तो मानी, साथ ही पाइपलाइन बिछाने में भ्रष्टाचार की तरफ भी इशारा किया।

रिपोर्ट में कहा गया, ”बलिया के सभी 17 ब्लॉक में जल आपूर्ति के लिए 66 टंकियाँ बनाई गई हैं। एनएलएम ने पाँच जगहों का दौरा किया और सब जगह पाइपलाइन टूटी पाई गई और पाइप लाइन की कवरेज भी उचित नहीं है। इस तरह से जल-आपूर्ति की सही व्यवस्था नहीं है।”

TERI स्कूल ऑफ एडवांस स्टडीज द्वारा हाल ही में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के 40 जिलों में 2.34 करोड़ लोग आर्सेनिक ज़हर की चपेट में हैं। आर्सेनिक से सबसे ज्यादा प्रभावित ज़िले बलिया, बाराबंकी, गोरखपुर, गाजीपुर, गोंडा, फैजाबाद और लखीमपुर खीरी हैं। अधिकांश प्रभावित जिले गंगा, राप्ती और घाघरा नदियों की बाढ़ के मैदानों में स्थित हैं।

बलिया शहर से तीस मिनट की दूरी पर स्थित रामगढ़ गांव के निवासी तीस वर्षीय राज कुमार पांडे कहते हैं कि 2015 में उनके पिता की मौत हो गई, “मैंने अपने पिता बनारसी पांडे (47) को भूजल में भारी मात्रा में आर्सेनिक के कारण खो दिया। भूजल में आर्सेनिक होता है, जिसके कारण पेट में कई संक्रमण हो जाते हैं। गाँव में कई लोग उसी उम्र में मर गए।”

इस क्षेत्र के सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों में से एक सदर अस्पताल के स्किन स्पेश्लिस्ट डॉ. बी नारायण जिन्होंने आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्रों में काम किया है ने न्यूज़ सेंट्रल को बताया, “स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव स्थिति को बदतर बना रहा है। कुछ बीमारियां इलाज योग्य हैं, लेकिन हमारे पास समय के भीतर इसका पता लगाने के लिए दवाएं और प्रयोगशालाएं नहीं हैं।”

अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. शिवप्रसाद ने कहा, “2500 से 4000 रोगियों के लिए हमारे पास केवल 9 क्लीनिकल डॉक्टरों के साथ 293 ज़रूरी दवाएं हैं जो सरकार प्रदान करती हैं। अस्पताल में आर्सेनिक से संबंधित बीमारी के इलाज के लिए कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है। ऐसे में हमें मरीजों को बनारस रेफर करना पड़ता है।”

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