सपा-बसपा गठबंधन ने बढ़ाई मुश्किलें, क्या बलिया सीट बचा पायेंगे BJP के भरत?

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फ़ोटो -सांसद भरत सिंह फेसबुक पेज

बलिया

लोकसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ आने से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की मुश्किलें बढ़ती नज़र आ रही हैं।

जिन सीटों पर 2014 में भाजपा ने मोदी लहर के सहारे कब्ज़ा जमाया था, वह सीटें अब सपा-बसपा गठबंधन के खाते में जाती दिखाई दे रही हैं। इन सीटों में पूर्वांचल की बेहद अहम सीट बलिया भी शामिल है। जहां 2014 लोकसभा चुनावों में भाजपा के उम्मीदवार भरत सिंह ने जीत कर भगवा लहराया था।

फ़ोटो-सांसद भरत सिंह फेसबुक पेज

उन्होंने सपा के उम्मीदवार नीरज शेखर  को भारी मतों से हराया था। यहां बसपा चौथे स्थान पर थी। जबकि मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल ने यहां तीसरा स्थान हासिल किया था। अब कौमी एकता दल का बसपा में विलय हो चुका है और बसपा 2019 का चुनाव सपा के साथ लड़ने जा रही है।

 

गठबंधन के इस नए समीकरण को देखते हुए यह कहना मुश्किल नहीं कि अब भाजपा के लिए इस सीट को बचा पाना बेहद मुश्किल है। 2014 में भाजपा के उम्मीदवार भरत सिंह ने 17 लाख 68 हज़ार 271 वोटर्स वाली बलिया लोकसभा सीट पर 3 लाख 59 हजार 758 वोट हासिल कर जीत का परचम लहराया था।

वहीं सपा उम्मीदवार नीरज शेखर 2 लाख 20 हजार 324 वोट हासिल कर दूसरे स्थान पर रहे थे। जबकि कौमी एकता दल के उम्मीदवार अफज़ल अंसारी ने 1 लाख 63 हजार 943 वोट के साथ तीसरा स्थान हासिल किया। इस रेस में बसपा भी ज़्यादा पीछे नहीं थी।

फ़ोटो-सांसद नीरज शेखर फेसबुक पेज

बसपा के उम्मीदवार वीरेंद्र कुमार पाठक ने यहां 1 लाख 41 हज़ार 684 वोट हासिल कर चौथे स्थान पर रहे थे। 2014 में यहां 15 प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरे थे, लेकिन अब गठबंधन के बाद यहां प्रत्याशियों की संख्या भी कम हो सकती है।

इन तमाम फैक्टर्स के मद्देनज़र यहां भाजपा के कब्ज़े पर ख़तरा मंडराता नज़र आ रहा है, वहीं गठबंधन से बने वोटों के नए समीकरण सपा-बसपा उम्मीदवार की जीत की ओर इशारा कर रहे हैं। ख़ैर यह तो महज़ कयास हैं, असली नतीजों का फिलहाल चुनाव होने तक इंतेज़ार करें।

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