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क्राउन प्रिंस सलमान की क़ैद में है सऊदी अरब का सबसे अमीर आदमी

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सऊदी अरब में भ्रष्टाचार के आरोपों के नाम पर हिरासत में लिए गए कई शहज़ादों और कारोबारियों को भले ही रिहा कर दिया गया हो, लेकिन एक शख़्स अब भी क़ैद में हैं.

सऊदी बिज़नेसमैन मोहम्मद हुसैन अल अमौदी को फ़ोर्ब्स मैगज़ीन ने कभी दुनिया का सबसे अमीर काला आदमी कहा था.

मोहम्मद हुसैन अल अमौदी की ज़िंदगी में पिछले साल नवंबर महीने में उस वक्त एक बड़ा मोड़ आया जब उन्हें रियाद के रिट्ज़ कार्लटन होटल में कई सऊदी शहज़ादों और कारोबारियों के साथ हिरासत में ले लिया गया था.

साल 1946 में इथियोपिया में जन्मे अल अमौदी एक यमनी कारोबारी और इथियोपियाई मां के बेटे हैं. किशोर उम्र में ही वे सऊदी अरब आ गए थे और साठ के दशक में उन्होंने सऊदी नागरिकता ले ली.

फ़ोर्ब्स मैगज़ीन के मुताबिक़ मोहम्मद हुसैन अल अमौदी मार्च, 2014 में 15.3 अरब डॉलर की दौलत के मालिक थे और उनकी कंपनी में 40 हज़ार लोगों को रोज़गार मिला हुआ है. वे सऊदी अरब के दूसरे सबसे अमीर शख़्स हैं.

मोहम्मद हुसैन अल अमौदी के क़रीबी सहयोगी कहते हैं कि सऊदी अरब के रक्षा मंत्री रहे पूर्व क्राउन प्रिंस सुल्तान बिन अब्दुल अज़ीज़ के साथ उनके अच्छे रिश्ते थे.

पूर्व क्राउन प्रिंस सुल्तान बिन अब्दुल अज़ीज की मौत साल 2011 में हो गई थी. उस वक़्त मोहम्मद हुसैन अल अमौदी अपना बिज़नेस प्रिंस सुल्तान बिन अब्दुल अज़ीज़ और उनके ताक़तवर दोस्तों के पैसों से मैनेज करते थे.

अस्सी के दशक में मोहम्मद हुसैन अल अमौदी ने भूमिगत तेल भंडारण के कारोबार में कदम रखा. इसके अलावा कंस्ट्रक्शन से लेकर, इंजीनियरिंग, फ़र्नीचर और दवा के कारोबार में भी वे दखल रखते थे.

इथियोपिया में दबदबा

इतना ही नहीं मोहम्मद हुसैन अल अमौदी इथियोपिया में ख़ासा दखल रखते थे.

विकीलीक्स के ज़रिए अमरीकी विदेश मंत्रालय के लीक हुए दस्तावेज़ों के मुताबिक़ मोहम्मद हुसैन अल अमौदी का नब्बे के दशक में इथियोपिया में इस कदर दबदबा था कि उन्हें कॉफ़ी से लेकर टूरीज़्म तक लगभग हर कारोबार में सरकारी संरक्षण हासिल था.

सऊदी अरब के मरहूम सुल्तान किंग अब्दुल्ला बिन अब्दुल अज़ीज़ भी मोहम्मद हुसैन अल अमौदी के ख़ासे मुरीद थे.

दरअसल, इथियोपिया में मोहम्मद हुसैन अल अमौदी का एक बड़ा एग्रीकल्चर प्रोजेक्ट चल रहा था और जिससे सऊदी अरब को चावल की सप्लाई की गारंटी मिली हुई थी.

सऊदी अरब में मोहम्मद हुसैन अल अमौदी की गिरफ़्तारी की प्रतिक्रिया इथियोपिया में भी हुई. सत्तारूढ़ पार्टी ने इसे एक नुक़सान बताया था तो वहां की विपक्षी पार्टी ने उनके हिरासत में लिए जाने पर असंतोष जाहिर किया था.

वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी लॉ स्कूल के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर हिनुक गबीसा कहते हैं कि इथियोपिया में मोहम्मद हुसैन अल अमौदी की मौजूदगी या गैरहाजिरी से बहुत फ़र्क़ पड़ता है.

प्रिंस अल वलीद बिन तलाल की तरह ही मोहम्मद हुसैन अल अमौदी भी क्लिंटन फ़ाउंडेशन को लाखों डॉलर चंदा देते हैं.

पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन मोहम्मद हुसैन अल अमौदी के प्राइवेट जेट से साल 2011 में इथोपिया का दौरा कर चुके हैं. इसे लेकर अमरीका में बहस भी छिड़ी थी.

वो पहला मौका नहीं था जब मोहम्मद हुसैन अल अमौदी को लेकर अमरीका में विवाद हुआ था. वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले के तीन साल बाद मोहम्मद हुसैन अल अमौदी पर चरमपंथी गतिविधियों के लिए पैसा मुहैया कराने का आरोप लगा था.

साभार- बीबीसी हिंदी

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कोरोना को लेकर जानें क्या चेतावनी दे रहे वैज्ञानिक, सुनकर खिसक जाएगी पैरों तले जमीन

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कोरोना वायरस को लेकर इस समय जहां पूरी दुनिया में सहमे हुए हैं, वहीं सरकारें भी अपने-अपने देश को बचाने को लेकर खासे चिंतित है. चूंकि कोरोना का अब तक कोई सटिक उपचार ईजाद नहीं हुआ, लिहाजा अब इसे लेकर वैज्ञानिक भी चेतावनी जारी किए हैं. आइए जानतें है कि कोरोना को लेकर दुनिया के वैज्ञानिक क्या कह रहे है.

– हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में महामारी विशेषज्ञ और स्टडी के लेखक मार्क लिपसिच ने कहा, संक्रमण दो चीजें होने पर फैलता है- एक संक्रमित व्यक्ति और दूसरा कमजोर इम्यून वाले लोग. जब तक कि दुनिया की ज्यादातर आबादी में वायरस के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित नहीं हो जाती है, तब तक बड़ी आबादी के इसके चपेट में आने की आशंका बनी रहेगी. वैक्सीन या इलाज ना खोजे जा पाने की स्थिति में 2025 में कोरोना वायरस फिर से पूरी दुनिया को अपनी जद में ले सकता है. महामारी विशेषज्ञ मार्क का कहना है कि वर्तमान में कोरोना वायरस से संक्रमण की स्थिति को देखते हुए 2020 की गर्मी तक महामारी के अंत की भविष्यवाणी करना सही नहीं है.

– यूके सरकार की वैज्ञानिक सलाहकार समिति ने सुझाव दिया था कि अस्पतालों पर मरीजों का बोझ बढ़ने से रोकने के लिए लंबे वक्त तक फिजिकल डिस्टेंसिंग बनाए रखने की जरूरत है. समिति ने कहा कि देश में करीब एक साल तक सरकार को कभी सख्ती तो कभी थोड़ी ढील के साथ सोशल डिस्टेंसिंग के नियम जारी रखने चाहिए. शोध के मुताबिक, नए इलाज, वैक्सीन के आने और स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर होने की स्थिति में फिजिकल डिस्टेंसिंग अनिवार्य नहीं रह जाएगा लेकिन इनकी गैर-मौजूदगी में देशों को 2022 तक सर्विलांस और फिजिकल डिस्टेंसिंग लागू करनी पड़ सकती है. शोधकर्ताओं ने कहा कि कोरोना वायरस संक्रमण को लेकर अभी कई रहस्य सुलझे नहीं हैं, ऐसे में बहुत लंबे वक्त के लिए इसकी सटीक भविष्यवाणी कर पाना मुश्किल है. अगर लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता स्थायी हो जाती है तो कोरोना वायरस पांच सालों या उससे ज्यादा लंबे समय के लिए गायब हो जाएगा. अगर लोगों की इम्युनिटी सिर्फ एक साल तक कायम रहती है तो बाकी कोरोना वायरसों की तरह सालाना तौर पर इस महामारी की वापसी हो सकती है.

– शोधकर्ता लिपसिच ने कहा, इस बात की ज्यादा संभावनाएं हैं कि दुनिया को करीब एक साल के लिए आंशिक सुरक्षा हासिल हो जाए. जबकि वायरस के खिलाफ पूरी तरह सुरक्षा हासिल करने के लिए कई साल लग सकते हैं. फिलहाल, हम सिर्फ कयास ही लगा सकते हैं. सभी परिस्थितियों में ये बात तय है कि एक बार का लॉकडाउन कोरोना को खत्म करने के लिए काफी नहीं होगा. पाबंदियां हटते ही कोरोना वायरस का संक्रमण फिर से पैर पसार लेगा.

– यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग में सेल्युलर माइक्रोबायोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. सिमन क्लार्क ने द इंडिपेंडेट से बातचीत में कहा कि कोरोना वायरस के एंडगेम की तारीख बताना असंभव बात है. उन्होंने कहा, अगर कोई आपको कोरोना वायरस के अंत की तारीख बता रहा है तो इसका मतलब है कि वे क्रिस्टल बॉल देखकर भविष्यवाणी कर रहे हैं. सच्चाई तो यह है कि कोरोना वायरस फैल चुका है और अब यह हमारे साथ हमेशा के लिए रहने वाला है.

– साउथहैम्पटन यूनिवर्सिटी में ग्लोबल हेल्थ के शोधकर्ता माइकल हेड का कहना है कि कोरोना वायरस के बारे में कोई भी अंदाजा लगाना मुश्किल है. ये बिल्कुल नया वायरस है और दुनिया भर में महामारी का रूप धारण कर चुका है. उन्होंने कहा कि आने वाले कुछ महीनों में कोरोना वायरस संक्रमण के मामलों में गिरावट देखने को मिल सकती है. हालांकि, सर्दी के आते ही कोरोना वायरस के मामले फिर से बढ़ सकते हैं क्योंकि उस वक्त फ्लू भी दस्तक दे देगा.

– इंपीरियल कॉलेज लंदन के प्रोफेसर नील फार्ग्युसन के मुताबिक, सोशल डिस्टेंसिंग जैसे कदम संक्रमण की धीमी रफ्तार के लिए बहुत जरूरी हैं.जब तक वैक्सीन नहीं आ जाती, तब तक बड़े पैमाने पर सोशल डिस्टेंसिंग की जरूरत बनी रहेगी. कॉलेज की ही एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि कोरोना वायरस की वैक्सीन बनने में करीब 18 महीनों का वक्त लग सकता है.

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बलिया ने देश के साथ विदेश को भी दिया पीएम, इस देश के प्रधानमंत्री की जड़े अपने जिले से जुड़ी हैं

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बलिया डेस्क: अपने बलिया का नाम न सिर्फ देश में बल्कि विदेशों में भी तमाम वजहों से फैला हुआ है. यहाँ से जुड़े लोगों ने दुनिया भर में अपना परचम लहराया है और बलिया का नाम रौशन किया है. यूँ ही नहीं बलिया को बागियों का शहर कहा जाता है. है कुछ ख़ास यहाँ की मिटटी में. बलिया से देश की आज़ादी के लिए लड़ने वाले महान क्रांतिकारी निकले हैं वही आज़ाद भारत की सियासत को अलग मोड़ देने वाले तमाम नेता भी यहीं से निकले हैं.

बलिया ने चंद्रशेखर के रूप में देश को प्रधानमंत्री भी दिया है लेकिन आज हम आपको एक और ख़ास बात बताने जा रहे हैं. क्या आपको मालूम है कि मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद जुगनाथ की जड़ें बलिया से जुड़ी हुई हैं.दरअसल यह बात बिलकुल सच है और इसी का पता लगाने के लिए एक बार कुछ महीनों पहले मॉरीशस के उच्चायुक्त जगदीश्वर गोवर्धन भी बलिया आए थे.

मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद जुगनाथ ने उन्हें अपने पूर्वजों का पता लगाने के लिए एक बार बलिया भेजा था और वह यहाँ आये भी थे. इस दौरान उन्होंने तारीफ करते हुए कहा था कि बलिया ने न सिर्फ देश को प्रधानमंत्री दिया है बल्कि विदेश को प्रधानमंत्री दिया है. इस दौरान उन्होंने अपनी खोज के बाद साफ़ कहा था कि मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद जुगनाथ के पूर्वज बलिया के रसड़ा से ताल्लुक रखते थे.

उन्होंने कहा था कि इस बात का उन्हें प्रमाण भी मिल चुका है. उन्होंने कहा था कि फिलहाल तो इस पर कुछ ज्यादा नहीं बता सकता लेकिन वह और जानकारी जुटाने की कोशिश में लगे हुए हैं. इस दौरान उन्होंने मॉरीशस से सुंदर देश भारत को कहा था.बहरहाल, फिलहाल तो उन्हें अपनी खोज में कहाँ तक सफलता मिली इसके बारे में तो कुछ नहीं कहा जा सकता है और न ही उसके बाद उनकी तरफ से कोई बयान आया.

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बाढ़ पीड़ितों की मदद को आगे आया बलिया का यह शख्स, यूगांडा से भेजी इतनी बड़ी रक़म

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दिल्ली डेस्क: भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और विकसित करने का दायित्व सिर्फ भारतवासियों का ही नहीं बल्कि सात समंदर पार बसे उन अप्रवासी भारतीयों का भी है जिनके दिलों में भारत धड़कता है। यह काम वह बख़ूबी कर रहे हैं।

तमाम भारतीयों ने पूरी ईमानदारी से यह प्रयास किया है कि वे अधिक से अधिक अपने मूल्यों, परंपराओं, रीति रिवाजों, तीज-त्योहारों और संस्कृति को उसी रूप में जीवंत रखें जिस रूप में उनका पुराना वैभव और सौन्दर्य जगमगाता है। इस बीच प्रवासीयों की एक बड़ी संस्था -ईस्ट इंडिया कल्चरल एसोसिएशन (EICA) ने भी बड़ा कदम उठाते हुए बिहार पीड़ितों के लिए 2 लाख की राशि भेजा है।

इसमें खुशी की बात ये है कि इस संस्था EICA के चेयरपर्सन संतोष तिवारी बलिया के मूल निवासी हैं। अभी पिछले हाल ही में युगांडा की राजधानी कंपाला में भारतीय दूतावास की ओर से आयोजित अप्रवासी भारतीय सम्मान समारोह में भारतीय लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के साथ मंच भी साझा कर चुके हैं। जिसमें उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड के विधान सभा अध्यक्ष भी भारतीय प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित थे।

संतोष तिवारी ने बताया कि इस मुश्किल घड़ी में मैं अपने देशवासियों के साथ खड़ा हूँ। बिहार में आई भीषण बाढ़ के प्रकोप और उससे हुई जन और हानि से हम सब अत्यंत ही विचलित हैं। इस बाढ़ आपदा से पूरे राज्यभर में जबरदस्त तबाही मच गई। कई लोग बाढ़ की वजह से बेघर हो गये तो,वहीं कई लोगों की जिंदगी चली गई। ऐसे में युगांडा में बसे हम बिहार और उत्तर प्रदेश के प्रवासियों ने मिलकर अपने भाईयों की तरफ़ मदद का हाथ बढ़ाया है।

हमने “ईस्ट इंडिया कल्चरल एसोसिएशन” (EICA) के माध्यम से बिहार के “मुख्यमंत्री बाढ़ राहत कोष” में करीब 2 लाख रूपये दान किये हैं। ईस्ट इंडिया कल्चरल चेयरपर्स संतोष तिवारी के प्रतिनिधि के रूप में एसोसिएशन के संयुक्त कोषाध्यक्ष अमितेश कुमार, जो मूल रूप से झारखंड (बोकारो) के निवासी हैं, ने बातचीत में बताया कि युगांडा में रहने वाले बिहार औऱ यूपी के लोगों से चंदा इकट्ठा कर बिहार के “मुख्यमंत्री राहत कोष” में जमा कराया गया है।

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