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बलिया- मऊ को 28 रनों से हराकर गाजीपुर सेमीफाइनल में पंहुची

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बलिया डेस्क : बलिया के चिलकहर में चल रही अंतर्राज्यीय 20-20 क्रिकेट प्रतियोगिता में बृहस्पतिवार को गाज़ीपुर क्रिकेट एकेडमी ने अभिषेक के शानदार 62 रनों की बदौलत मऊ को 28 रनों से पराजित कर सेमी फाइनल में प्रवेश कर लिया ।

टॉस जीतकर गाज़ीपुर क्रिकेट एकेडमी के कप्तान ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए निर्धारित 20 ओवर में 8 विकेट की क्षति पर 149 रन बनाए, जिसमें अभिषेक ने 62 रन (16,64) सौरव ने 25 (16,44) तथा विशाल ने 21(14,61) रनों का योगदान दिया।मऊ की तरफ से गेंदबाजी करते हुए निगम व राहुल ने क्रमशः 2-2 तथा आलोक व अवनीत ने 1-1 विकेट प्राप्त किए।

150 रनों के जवाब में खेलने उतरी मऊ की पूरी टीम गाज़ीपुर क्रिकेट एकेडमी की साधी गेंदबाज़ी के आगे 121 रनों पर आल आउट हो गई , जिसमे गामा ने 30 रन (62) , राहुल ने 25 रन (43) बनाएं, गाज़ीपुर क्रिकेट एकेडमी की ओर से अश्विनी व विशाल यादव ने 2-2, सौरव,अजय तथा अभिनव ने 1-1विकेट प्राप्त किए , अश्विनी ने शानदार गेंदबाजी करते हुए 4 ओवर में एक मेडन के साथ मात्र 10 रन दिए ।

रिपोर्ट- विनय राठौर

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बलिया के दीनानाथ के घर बनने की कहानी है इंसानियत की मिसाल

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महेश ने दीनानाथ के घर के लिए अपनी दुकान से मोटर दिया।

आए दिन कई वजहों से हमारा भरोसा मानवता और इंसानियत पर से उठने लगता है। ऐसा अनुभव होता है मानो दुनिया स्वार्थ के चंगुल में बुरी तरह फंस चुकी है। जहां से निकल पाना अब लगभग नामुमकिन सा है। लेकिन कभी-कभार ऐसे कुछ उदाहरण हमारे सामने उभर कर आते हैं जो इंसानियत की जिंदा मिसाल साबित होती हैं। ऐसा ही एक उदाहरण पेश किया है बलिया के लोगों ने। बलिया जिले के बांसडीह में दीनानाथ नाम के व्यक्ति का एक घर युवाओं ने अपनी मदद से बनवाई है।

बांसडीह में बलुई रामपुर नाम का एक गांव है। 56 साल के दीनानाथ बलुई रामपुर गांव के ही रहने वाले हैं। दीनानाथ गांव और आसपास के क्षेत्रों में मेहनत-मजदूरी का काम करते हैं। लेकिन मजदूरी इतनी ही मिल पाती है जिससे किसी तरह दो वक्त को चुल्हा जल सके। कोरोना महामारी के समय में दो सालों तक मजदूरी का काम भी पूरी तरह ठप ही रहा। जिसकी वजह स्थिति और भी बिगड़ गई।

आर्थिक तौर बेहद कमजोर दीनानाथ के पास सिर छुपाने को अपना पक्का मकान भी नहीं था। दीनानाथ अपने परिवार के साथ एक छोटी सी झोपड़ी में रहते थे। दीनानाथ के दो बच्चे हैं, एक बेटी और एक बेटा। बेटी बड़ी है और घर का काम करती है। जबकि बेटा अपने पिता के साथ ही ईंट के भट्टे पर मजदूरी करने जाता है। 2017 में उनकी पत्नी का निधन हो गया था। पत्नी बोन मैरो बीमारी की समस्या से पीड़ित थी।

बलुई रामपुर और बांसडीह के लोग उनकी मदद के लिए आगे आए। लगभग सभी वर्ग के लोगों ने योगदान देकर दीनानाथ के लिए एक पक्का मकान बनवाया। उनके मकान बनवाने में किसी ने बालू खरीदा। तो किसी ने ईंट। लोगों ने अपनी क्षमता के अनुसार इस मकान के निर्माण में सहयोग किया। घर बन जाने के बाद पानी की व्यवस्था का सवाल आया। तब ओम साईं पाइप स्टोर के मालिक महेश ने हाथ बढ़ाया।

बलिया जिले के जापलीगंज के रहने वाले महेश ने दीनानाथ को एक मोटर और अन्य जरूरी सामान उपलब्ध कराया। 40 वर्षीय महेश हार्डवेयर की दुकान चलाते हैं। जापलीगंज में ही उनकी हार्डवेयर की दुकान है। दीनानाथ के पास अब अपना घर भी है और पानी के लिए मोटर भी। दीनानाथ गांव वालों की इस मदद पर भावुक हैं।

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बलिया के शख्स को 13 सालों तक पठानकोट में किसने बनाया बंधक? 

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2008 का साल था जब मोहन बिंद बलिया से पठानकोट गए थे। (फोटो साभार: अमर उजाला)

बलिया के रहने वाले मोहन बिंद 13 वर्षों बाद पठानकोट अपने घर लौटे। 49 साल के मोहन बिंद बलिया जिले के बांसडीह रोड थाना क्षेत्र के टघरौली गांव के निवासी हैं। एक दशक से अधिक वक़्त बीत जाने के बाद जब मोहन अपने घर पहुंचे तो परिवार की खुशी का ठिकाना ना रहा।

मोहन बिंद बीते शनिवार की रात टघरौली पहुंचे। घर पहुंचते ही पत्नी सीतिया देवी मोहन बिंद को पकड़कर कर रोने लगी। मोहन बिंद के तीन बेटे और दो बेटियां हैं। पूरा परिवार खुशी के

आंसू से तर था। मोहन बिंद के घर गांव-जवार के लोगों का जमावड़ा लगा था। घर वालों ने बताया कि वो जल्द ही बलिया की जिलाधिकारी से मिलेंगे।

बता दें कि 2008 का साल था जब मोहन बिंद बलिया से पठानकोट गए थे। मोहन पठानकोट रोजगार की तलाश में गए थे। इस दौरान उनकी मुलाकात एक ढाबा के मालिक से हुई। ढाबा वाले ने मोहन बिंद को पंद्रह हजार की तनख्वाह पर एक नौकरी दी। एक महीने बाद जब मोहन बिंद ने ढाबा मालिक से पैसा मांगा तो उसने तनख्वाह नहीं दिया। इसके बदले मोहन को बंधक बना लिया। उसके बाद से ही मोहन बिंद पठानकोट में थे।

घरवालों के अनुसार किसी दिन बांसडीह रोड थाना क्षेत्र के सोनपुर कला निवासी सेना के दो जवान रामजी सिंह और सतेद्र सिंह इत्तेफाक से उसी ढाबे पर पहुंच गए। खाना खाने के दौरान मोहन ने दोनों जवानों से भोजपुरी में “और कुछ लेने के बारे में पूछा”। भाषा से रामजी सिंह और सतेद्र सिंह समझ गए कि मोहन बलिया जिले का है।

रामजी सिंह और सतेद्र सिंह ने मोहन से बातचीत की तब सारी कहानी खुलकर सामने आई। जिसके बाद सेना के जवानों ने मोहन की एक तस्वीर उसके घर पहचान के लिए भेजी। पहचान हो जाने के बाद घर के कुछ लोग पठानकोट पहुंच गए। सेना की मदद से ढाबे पर छापा मारा गया। छापेमारी में मोहन बिंद मिल गए। लेकिन ढाबे का मालिक फरार हो गया।

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बलिया से सीवान को जोड़ने वाले पुल का 5 साल में भी नहीं हो सका आधा कार्य पूरा?

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बलिया से सीवान को जोड़ने वाले पुल का पांच साल में भी नहीं हो सका आधा कार्य पूरा? (प्रतिकात्मक तस्वीर)

उत्तर प्रदेश का बलिया एक सीमावर्ती जिला है। बलिया जिला बिहार की सीमा से सटा हुआ है। बिहार का सीवान जिला भी बलिया से लगता है। इन दोनों जिलों में व्यवसाय और निजी वजहों से भी आवाजाही खूब होती है। बलिया से गुजरने वाली सरयू नदी के कारण सीवान से इसकी दूरी बढ़ जाती है। दूरी बढ़ जाने के चलते आवागमन मुश्किल हो जाती है। इसे देखते हुए सरयू नदी पर पुल बनाने की योजना बनी।

बलिया के बांसडीह में चांदपुर के सामने सरयू में पुल निर्माण का कार्य चल रहा है। आने वाले वक्त में यह पुल बलिया और बिहार के सीवान जिले को जोड़ेगा। चांदपुर के सामने सरयू नदी में बन रहे पुल का निर्माण कार्य आज से पांच साल पहले शुरू हुआ था। बलिया से सीवान जाने के लिए फिलहाल 140 से 150 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। लेकिन माना जा रहा है कि सरयू नदी में यह पुल बन जाने के बाद बलिया और सीवान के बीच की दूरी लगभग 60 किलोमीटर ही रह जाएगी।

चांदपुर के सामने सरयू नदी में बन रहे इस पुल की लागत है 224 करोड़ रूपए है। साल 2016 में पुल का निर्माण कार्य शुरू हुआ था। काम शुरू हुए पांच साल हो चुके हैं। लेकिन अब तक इस पुल का पचास फीसदी काम भी पूरा नहीं हुआ है। दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस पुल का अब तक 45 फीसदी कार्य ही हो सका है। खबर के अनुसार 2023 तक इस पुल का निर्माण कार्य पूरा हो पाएगा।

बांसडीह के निवासी प्रवीण तिवारी ने बलिया खबर से बातचीत में कहा कि “अगर लगातार काम चलता तो अब तक पुल बन गया होता। लेकिन रेगुलर काम होता नहीं है। उधर कोरोना की वजह से भी पुल निर्माण का काम ठप पड़ा हुआ था। जब काम शुरू भी होता है तो सरकारी तौर-तरीके से कछुआ की चाल से सब चल रहा है।” प्रवीण ने बताया कि हमारी रिश्तेदारी है सीवान के जिला कार्यालय से बीस किलोमीटर पूरब दिशा में। पर्व-त्योहार या जरूरत पड़ने पर जाने से पहले सोचना पड़ता है। क्योंकि मांझी और उभांव होकर जाना पड़ता है। ये यात्रा लंबी पड़ती है। अगर पुल बन गया तो आना-जाना कुछ आसान हो जाएगा। लेकिन देखिए कि बीरबल की खिंचड़ी कब तक पकती है?”

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