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बलिया- जनता को परेशान कर रहे अधिकारी, अंत्योदय कार्ड बनाने के नाम पर इंस्पेक्टर ने मांगे 10 हजार!

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बलिया डेस्क : राशन कार्ड बनाने में विभागीय कर्मचारियों की उदासीनता लोगों पर भारी पड़ रही है. आलम यह है कि शासन के तमाम फरमान के बाद भी जिला प्रशासन और आपूर्ति महकमे के अफसर अपने निजी स्वार्थों में लोगों का अंत्योदय और पात्र गृहस्स्थी कार्ड बनाने में अलग-अलग तरीके से परेशान करेंगे.

इस बावत शिकायत करने के बाद प्रशासन के अफसर भी सुनने को तैयार नहीं हैं. ऐसा ही एक मामला मंगलवार को सदर तहसील में आयोजित संपूर्ण समाधान दिवस के दौरान देखने को मिला. जब अंत्योदय के लिए आयी एक महिला ने आपूर्ति निरीक्षक पर 10 हजार रुपये मांगने का आरोप लगाया.

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सदर तहसील में आयोजित संपूर्ण समाधान दिवस के दौरान हनुमानगंज ब्लाक की अंबिया खातून  ने एसडीएम को एक शिकायती पत्र देकर आरोप लगाया कि उसे 2005-06 में मेरा अंत्योदय कार्ड बना था. जिसका राशन कार्ड उचित राशन विक्रेता की दुकान पर मिलता था. इस कार्ड का राशन 2008 से 2019 तक प्रविष्टि अंकित रही.

लेकिन साजिश के तहत राशन कार्ड अप्रैल 2019 में अंत्योदय सूची से कटवा दिया गया. इस प्रकरण में तत्कालीन एसडीएम सदर ने खंड विकास अधिकारी के माध्यम से जांच रिपोर्ट मांगी. जिसमें जांच करते हुए ग्राम सचिव राजीव कुमार ने अंबिया को अंत्योदय के लिए पात्र बताते हुए रिपोर्ट सौंपी थी.

इस प्रकरण में पूर्ति निरीक्षक हनुमागंज ने जांच रिपोर्ट गायब कर महीने भर से अधिक समय तक भटकाता रहा. अंत में कहा कि अगर दस हजार रुपये दोगी तो दो दिन में कार्ड बना देंगें. इस प्रकरण की शिकायत सुनने के बाद ही एसडीएम भी महिला पर भड़क गये. उन्होंने कहा कि इस महिला को अंत्योदय के जगह पर पात्र गृहस्थी का कार्ड जारी कर दिया जाय.

जबकि बार-बार पीड़िता कहती रही कि उसके पति मजदूरी करते हैं. लेकिन उसकी किसी भी अफसर ने सुनने की जगह से उसे फटकार ही लगाई. पीड़िता ने चेताया कि उसकी मांग पूरी नहीं हुई तो हम आत्मदाह करने के लिए विवश होंगे.

रिपोर्ट- तिलक कुमार 

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शौर्यता और राजनीति में पहचान वाले बागी बलिया के बदहाली का ज़िम्मेदार कौन?

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यूं तो बलिया कभी किसी परिचय का मोहताज नहीं रहा। देखा जाए तो इतिहास के हर पन्ने में बलिया का नाम दर्ज है। 1857 की से लेकर 1942 में भारत की स्वतंत्रता से पूर्व ही समानांतर सरकार की स्थापना कर स्वयं को स्वतंत्र घोषित करने तक, तो वही आपातकाल के बाद की क्रांति के नायक जयप्रकाश नारायण से लेकर युवा तुर्क चंद्रशेखर के रूप में देश को 8वा प्रधानमंत्री देने का गौरव भी बलिया को प्राप्त है। ऐसे में यह उम्मीद करना लाजमी है कि विकास की दृष्टि से भी बलिया को अग्रणी होना चाहिए। लेकिन उसके उलट यदि जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही हैं।

राजनीति के क्षेत्र में भी बलिया का पर्याप्त दखल है। वर्तमान समय में संसद के दोनो सदनो में सांसद प्रदेश के मंत्रिमंडल में 2 मंत्रियों और सत्ता पक्ष के पांच विधायक इस जनपद से हैं बावजूद इसके बलिया आज उपेक्षाओं का शिकार है। बदलते दौर के साथ सियासत के मायने भी बदल गए हैं। जनप्रतिनिधियों को अब जनता की समस्याओं से कोई सरोकार नहीं रहा। यह विडंबना ही है कि आजादी के 73 वर्षो के बाद भी यहां की जनता मूलभूत सुविधाओं मसलन स्वच्छ पानी, स्वास्थ सुविधाओं आदि से वंचित है।कोरोना के दौरान स्वास्थ्य सेवा की बदहाली खुलकर सामने आई है।

जिले भर में तमाम सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र एवं प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र होने के बावजूद स्वास्थ्य उपकरण तथा आक्सीजन व एम्बुलेंस के अभाव के कारण यहां के मरीज इलाज के लिए दूसरे जनपदों में जाने को मजबूर है। देखा जाए तो शिक्षा की दृष्टि से भी बलिया के हालात कुछ बेहतर नहीं है। प्राथमिक और मिडिल स्तर पर पढ़ाई के नाम पर मात्र खानापूर्ति हो रही है। विद्यालय शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। हालांकि 2016 में जननायक चंद्रशेखर यूनिवर्सिटी की स्थापना से शिक्षा के हालात में कुछ परिवर्तन जरूर हुआ है। लेकिन अभी भी से बेहतर नहीं कहा जा सकता है।

चुनाव के वक्त राजनीतिक पार्टियों द्वारा बडीं बडीं घोषणाएं की जाती है, लेकिन जीत हासिल करने के बाद यह घोषणाएं मात्र कागजों तक ही सिमट कर रह जाते हैं। जहां एक ओर बलिया जनप्रतिनिधि की अनदेखी का शिकार है तो दूसरी तरफ प्राकृतिक आपदा से भी त्रस्त है। प्रत्येक वर्ष जिलेवासी गंगा, घाघरा एवं टोंस नदी के बाढ़ और कटान का दंश झेलने को मजबूर है। कुछेक इलाकों में तो लोगों को पलायन तक करना पड़ता है। लेकिन जन प्रतिनिधियों और प्रशासन के तरफ़ से इसका कोई भी स्थाई समाधान नहीं हो सका है, मानो जनता को उसके हाल पर छोड़ दिया गया है।

रही सही कसर बारिश के पानी से जलभराव ने पूरी कर रखी है। इतना ही नही इलाके वासी आर्सेनिक युक्त जहरीला पानी पीने को मजबूर है, जिससे कि लोग गंभीर बीमारियों के चपेट में आ रहे है। बात अगर रोजगार की कीजाए तो इसमें भी बलिया फिसड्डी है, ऐसे में विकास की कल्पना बेमानी है। यहां सवाल यह है कि वीरता, शौर्यता और राजनीति के लिहाज से देश भर में अपनी पहचान बनाने वाल बलिया विकास का पहचान क्यों नहीं बन सका। आखिर बलिया के बदहाली का ज़िम्मेदार कौन है?

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बलिया की बेटी रीवा राजभर का IIT दिल्ली में रिसर्च एसोसिएट के पद पर हुआ चयन

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बलिया के​​​​​ सिकन्दरपुर क्षेत्र के जमुई गांव निवासी रविअंश कुमार राजभर की होनहार बेटी “कुमारी रीवा” का चयन भारतीय विज्ञान प्रौद्योगिकी विभाग नई दिल्ली (IIT) में रिसर्च एसोसिएट के पद पर हुआ है। रीवा शुरू से ही पढ़ने में होनहार थीं। उनकी प्राथमिक शिक्षा भारतीय विद्यापीठ प्ले वे स्कूल सिकंदरपुर से हुई। जबकि सेकेण्डरी शिक्षा ज्ञानकुंज अकादमी बंशी बाजार बलिया से हुई। रीवा की इस कामयाबी से पूरे परिवार और गांव में खुशी का माहौल बना हुआ है।

कुमारी रीवा का कहना है कि मेरे लिए ये बेहद खुशी का पल है, पूरा परिवार बेहद खुश है। कभी भी हार नहीं माननी चाहिए। अपने गोल को अचीव करने के लिए लगातार मेहनत करते रहें। सफलता खुद व खुद आपके पास आएगी। उन्होंने आगे कहा, आपको परिश्रम का फल जरूर मिलेगा।  इस मुकाम पर पहुंचने के लिए मेरे माता पिता व गुरुजनों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। वहीं रीवा के माता पिता जो कि अपना खुद का निजी विद्यालय चलाते हैं, कुमारी रीवा भी इस विद्यालय की छात्रा रह चुकी हैं।

रेव्व के पिता ने बताया, रीवा बचपन से ही किताबों में डूबी रहती थी तथा कहीं बेवजह घूम फिर कर अपना समय व्यर्थ नहीं करती थी। वह हर समय अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगती थी। बहुत ही मेहनत और लगन से पढ़ाई करती थी, तथा हमेशा ये बात कहती थी कि मुझे कुछ अलग और बड़ा काम करना है। आज रीवा की मेहनत और लगन रंग लाई है, जिसका हम दोनों पति-पत्नी को गर्व है कि हमारी बिटिया ने अपनी मेहनत और शिक्षा के बदौलत हमारा मान बढ़ाया।

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सुभासपा नेता शिवदयाल BJP में शामिल, बलिया में दिलचस्प हुआ पंचायत अध्यक्ष का चुनाव

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बलिया। उत्तर प्रदेश में जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव का शंखनाद हो चुका है। प्रदेश सरकार ने 15 जून से 3 जुलाई के बीच अध्यक्ष पद के चुनाव कराने की अधिसूचना पहले ही कर कर दी थी।गौरतलब है कि यूपी में त्रिस्तरीय पंचायतों के चुनाव मई में हुए थे, तभी से जिला पंचायत अध्यक्ष व क्षेत्र पंचायत प्रमुखों के चुनाव का बेसब्री से इंतजार हो रहा है। प्रदेश सरकार ने पहले जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव कराने का फैसला किया है, वहीं क्षेत्र पंचायत प्रमुखों के चुनाव जुलाई में कराए जाएंगे।मई में हुए पंचायत चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई समाजवादी पार्टी के हौसले बुलंद हैं। साथ ही सपा के पक्ष में माहौल भी है।

इस बीच बलिया में भी पंचायत अध्यक्ष चुनाव काफी दिलचस्प हो चुका है। बलिया में नेताओं का पार्टी बदलने का सिलसिला जारी है। पहले बसपा से समाजवादी पार्टी में वरिष्ठ नेता अम्बिका चौधरी आये। वहीं अब सभासपा के बड़े नेता भाजपा में शामिल हो गए हैं।प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह की संस्तुति पर जिलाध्यक्ष जयप्रकाश साहू ने बुधवार को सुभासपा के शिवदयाल चौधरी को भाजपा की सदस्यता दिलाई गई। पार्टी सूत्रों की मानें तो वार्ड नम्बर 48 से निर्वाचित इनकी जिला पंचायत सदस्य पत्नी सुप्रिया यादव भी जल्द ही भाजपा ज्वाइन कर सकती हैं।यही नहीं, भाजपा इन्हें बलिया में जिला पंचायत अध्यक्ष की उम्मीदवार भी घोषित कर सकती है।

बता दें कि, समाजवादी पार्टी ने पूर्व मंत्री अम्बिका चौधरी के पुत्र आनंद चौधरी को जिला पंचायत अध्यक्ष का प्रत्याशी बनाया है। आनंद चौधरी के नाम की घोषणा के बाद से ही जिले का राजनीतिक बढ़ा हुआ है।इस बीच, सुभासपा छोड़ शिवदयाल चौधरी ने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ले ली। शिवदयाल को भाजपा में मंत्री उपेन्द्र तिवारी नेे शामिल कराया। ऐसे में यह माना जा रहा है कि बलिया में जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव और दिलचस्प होगा।

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