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डॉक्टर से IAS टॉपर्स की सूची में शामिल आनंद शर्मा से जानिए कैसे हासिल किया ये मुकाम !

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यह हैं आनंद शर्मा. साल 2018 की यूपीएससी सीएसई एग्जाम में इनमा नाम टॉपर्स की सूची में नाम में शामिल था. आनंद शर्मा एमबीबीएस डॉक्टर थे, जिसके बाद यह यूपीएससी में आए. 2015 में इन्होने मुरादाबाद मेडिकल कॉलेज, दिल्ली से एमबीबीएस किया और इसके बाद से ही यूपीएससी सीएसई में लग गए. सफलता मिली चौथे प्रयास में. 2018 में. 62वीं रैंक हासिल की. दरअसल आनदं जब तीसरी बार टॉपर बने तो बीते हर साल में उनका निबंध में ग्राफ बढ़ता गया. ऐसे में अपने अनुभव के आधार पर वह निबंध लेखन और सेलेक्शन के बारे में कुछ टिप्स दे रहे हैं. डॉ. आनंद कहते हैं कि पेपर आने के बाद निबंध लिखने में जल्दबाजी न करें.

पहले सभी विषयों को अच्छे से पढ़ें और फिर सोचे की किस पर आप सबसे अच्छा इन पुट दे सकते हैं. वह कहते हैं कि पहले वह उन दो टॉपिक को हटा देते थे जिसमे उनके पास फॉर या अगेंस्ट में प्वॉइंट्स नहीं होते थे. इसके बड़े बचे हुए दो टॉपिक में फैसला कर सकते थे कि किस पर वह बढियां लिख सकते हैं. इसके बाद रफ में वह निबंध के फॉर और अगेंस्ट में जो कुछ भी आ रहा है उनके दिमाग में, वह सब लिख देते थे. और इसी के आधार पर वह आगे एक्सप्लेन करते थे. दरअसल फ्लो में लिखने के दौरान कुछ छूट न जाये, इसलिए वह ऐसा करते थे. निबंध के तीन हिस्से होते हैं. इंट्रोडक्शन, बॉडी और कॉन्क्लूजन.

आनंद कहते हैं कि इंट्रोडक्शन में कोई कोट लिख देने से अधिक प्रभाव पड़ता है. उन्होंने पहले ही मुख्य विषयों पर कोट तैयार किये हुए थे. वह कहते हैं कि अगर कोट नहीं भी मालूम तो आप किसी शानदार और प्रभावशाली लाइन से शुरुआत करें. बाद इसके अगले स्पेट में एक पैर में ऐस्से की समरी लिखते हैं. जिसमे यह बताते थे कि इस इससे में क्या-क्या है. एस्से के बॉडी में वह बिन्दुओं के अनुसार फॉर और अगेंस्ट दोनों एंगल्स लिखना चाहिए. साथ ही साथ उदाहरण भी दें.

रियल लाइफ का उदहारण हो तो और बेहतर. बाद इसके फैक्ट्स, फिगर्स, डेटा से लेकर कोट्स या जो भी हो, उसे लिखकर एस्से को वजनदार बनायें. इसके अलावा एस्से लिखने के दौरान समय बैलेंस्ड करके चले. वह बताते हों कि आपका एस्से का झुकाव फॉर की तरफ हो या अगेंस्ट की तरफ, जिस भी तरफ झुकाव हो, उसके विपरीत पॉइंट्स को भी लेकर चलें और ज़िक्र करें. चूँकि आप एक अधिकारी बनने के लिए एस्से लिख रहे हैं. ऐसे में एस्से का अंत पोजिटिव करें और समस्या का संभावित समाधान भी ज़रूर लिखें.

इसके अलावा वह कहते हैं कि एग्जाम से पहले खूब प्रैक्टिस करें. वह कहते हैं कि आपने जिस विषय पर एस्से लिखने की प्रैक्टिस की है अगर वही विषय एग्जाम में आ जाये तो हड़बड़ी में न रहें. बल्कि उसे अच्छी तरह पढ़ें और समझें कि उसमे क्या पूछा गया है. विषय से भटकना नहीं है.

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बलिया का फिर बढ़ा मान, कोवैक्सीन रिसर्चर डॉ. संजय राय बने EPC के सदस्य

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बलिया। हमेशा चर्चाओं में रहने वाले बलिया जिले के डॉक्टर संजय राय ने एक और सफलता हासिल की है। कोरोना की वैक्सीन कोवैक्सीन के रिसर्चर और दिल्ली एम्स में सामुदायिक चिकित्सा विभाग के डाक्टर संजय राय को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत उच्चतम नीति निर्धारक और संचालक संस्थान EPC यानि इम्पावर्ड प्रोग्राम कमेटी का सदस्य बनाया गया है। इस समीति में देश के कई नाम भी शामिल हैं। दरअसल स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने एनएचएम के तहत ईपीसी का पुनर्गठन किया गया है।

18 सदस्यीय कमेटी में सचिव स्वास्थ्य और परिवार कल्याण अध्यक्ष हैं। नीति आयोग के सीईओ भी सदस्य हैं। विभिन्न मंत्रालयों के सचिव सदस्य हैं। अपर सचिव और NHM के निदेशक विकास शील ने डॉ. संजय राय को पत्र लिख कर उन्हें समिति का सदस्य बनाए जाने की जानकारी दी। डॉ. संजय राय को उनके समुदायिक स्वास्थ्य में हासिल अनुभव को देखते हुए EPC में जगह दी गई। संजय राय को भारत सरकार की इस महत्वपूर्ण समिति का सदस्य बनाए जाने पर बलिया जिले के लोग काफी खुश हैं।

कोवैक्सीन की उपलब्धि से सुर्खियों में आए- कोरोना जैसी महामारी को मात देने के लिए डॉ. संजय राय और उनकी टीम ने दिन-रात मेहनत कर कोवैक्सीन बनाई। जिसका सफलतपूर्वक ट्रायल हुआ। तीन चरणों में ह्यूमन ट्रायल सफल होने के बाद कोवैक्सीन का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस वैक्सीन को आईसीएमआर और भारत बायोटेक के साथ मिलकर बनाया गया है। इतना ही नहीं 15 से 18 साल के बच्चों पर भी ट्रायल सफल होने के बाद कोवैक्सीन ही लगाई है। जो बलिया निवासी और एम्स में सामुदायिक चिकित्सा विभाग के प्रमुख ने अपनी टीम के साथ बनाई।

जिनकी हर तरफ तारीफ हुई। डॉ. संजय का अपने क्षेत्र से गहरा लगाव- डॉ. संजय राय बलिया के सिकंदरपुर कस्बे के निकट लिलकर गांव में पैदा हुए। इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई गांव में ही रहकर की है। बीएचयू से 1981 में चिकित्सा विज्ञान में ग्रेजुएट डॉ. संजय राय ने एमबीबीएस की पढ़ाई कानपुर मेडिकल कॉलेज से और एमडी बीएचयू से किया।

पढ़ाई पूरी करके बीएचयू के सर सुंदरलाल अस्पताल में कुछ दिनों तक अध्यापन करने के बाद डॉ. संजय चंडीगढ़ एम्स होते हुए फिलहाल दिल्ली एम्स में कार्यरत हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में बड़ा नाम बन चुके डॉ. संजय राय अपनी जड़ों से लगातार जुड़े रहते हैं। उनका अपने गांव लिलकर आना-जाना लगा रहता है।

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क्रिप्टो करेंसी के खतरे पर राज्यसभा सांसद नीरज शेखर ने सरकार से बेहद जरूरी सवाल पूछा!

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नई दिल्ली। दुनिया भर में क्रिप्टो करेंसी को लेकर बहस चल रही है। भारत में भी आजकल क्रिप्टो पर खूब चर्चा हो रही है। लोग जमकर इसमें निवेश कर रहे हैं। लेकिन बताया जा रहा है कि क्रिप्टो में निवेश करना लोगों के लिए घाटे का सौदा हो सकता है। इससे बचने की सलाह भी दी जा रही है। इसी बीच मंगलवार यानी आज बलिया जिले से राज्यसभा सांसद नीरज शेखर ने राज्यसभा में इस मुद्दे पर अपनी ही भारतीय जनता पार्टी की सरकार से सवाल पूछा है।

नीरज शेखर ने संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान प्रश्नकाल में क्रिप्टो करेंसी को लेकर भारत सरकार की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से दो सवाल पूछे। नीरज शेखर ने सवाल किया कि “सभी लोग बात कर रहे हैं कि बिल आने वाला है। लेकिन क्रिप्टो करेंसी यानी बिटकॉइन जो शुरू हुआ था एक डॉलर से और आज साठ हजार डॉलर उसका मूल्य है। एक अनुमान लगाया गया है कि भारत में करोड़ों लोगों ने इसमें निवेश किया है। लाखों-करोड़ रुपया इसमें चला गया है। क्या भारत सरकार उन लोगों को बताने की कोशिश कर रही है कि ये अभी सुरक्षित नहीं है? ये ऐसा पैसा लगा रहे हैं जिसमें आगे उनका नुकसान हो सकता है। हमारा वित्त मंत्रालय इस मामले में क्या कर रहा है?”

राज्यसभा में सांसद नीरज शेखर के इस सवाल का जवाब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दिया। निर्मला सीतारमण ने कहा कि “हां, बिल आएगी। लेकिन सेबी व आरबीआई के जरिए और एक बार भारत सरकार की ओर से बयान जारी कर यह बताने की कोशिश की गई है कि यह एक रिस्की क्षेत्र है। जो लोग इस ओर जा रहे हैं सचेत रहना चाहिए कि वो क्या कर रहे हैं।” वित्त मंत्री ने बताया कि “यह भी कहा गया है कि ये एक ऐसा क्षेत्र है जो अभी रेगुलेटरी फ्रेम में नहीं है। हमारी ओर से अलर्ट जारी किया जा चुका है कि यह अभी एक हाई रिस्की क्षेत्र है।”

इसके बाद राज्यसभा सांसद नीरज शेखर ने क्रिप्टो करेंसी को लेकर ही एक और सवाल पूछा। नीरज शेखर ने कहा कि “आप कहीं भी इंटरनेट पर कोई वेबसाइट खोलिए तो क्रिप्टो करेंसी के विज्ञापन बहुत आ रहे हैं। हमारे नौजवान साथी इसमें पैसा खूब लगा रहे हैं। तो क्या जब तक बिल आएगा तब तक के लिए इन विज्ञापनों को बंद करने का कोई उपाय हो सकता है?”

इंटरनेट पर क्रिप्टो करेंसी के विज्ञापन पर रोक लगाने के सवाल पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि “विज्ञापन को बंद करने का कोई उपाय अभी तक नहीं है। लेकिन युवाओं को इस बार में सावधान करने का और इसके रिस्क को लेकर ध्यान दिलाने के लिए सरकार के द्वारा कदम उठाया जा रहा है। सेबी और आरबीआई के द्वारा भी जागरुकता के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। मगर अब हम इस कगार पर पहुंच चुके हैं कि इस पर हमारा जल्दी आने वाला है।”

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बलिया मूल के मॉरिशस के पूर्व पीएम अनिरुद्ध जगन्नाथ का निधन

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मॉरीशस के पूर्व प्रधानमंत्री अनिरुद्ध जगन्नाथ का 91 साल की उम्र में 3 जून, 2021 को निधन गया है। अनिरुद्ध जगन्नाथ मॉरिशस के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दोनों ही पदों पर कार्य कर चुके हैं। जगन्नाथ के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर ने दुख जताया है।

बलिया से मॉरिशस पहुंचे उनके पिता ने अपने साथी मजदूरों के साथ मिलकर ऐसे राष्ट्र का निर्माण किया, जो हमेशा हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तानियों के दिलों में धड़कता रहा है। उनके असमय जाने से बलिया ही नहीं समूचे हिन्दुस्तानियों  को आघात पहुंचा है।

मॉरीशस के पूर्व राष्ट्रपति अनिरुद्ध जगन्नाथ के पूर्वज उत्तर प्रदेश में बलिया जिले के मूल निवासी थे। बलिया जिले के रसड़ा थाना क्षेत्र का अठिलपुरा गांव उनके पुरखों का निवास स्थान रहा है। गांव वालों के अनुसार उनके पिता विदेशी यादव और चाचा झुलई यादव को अंग्रेजों ने वर्ष 1873 में गिरमिटिया मजदूर के रूप में जहाज से गन्ने की खेती के लिए मारीशस भेजा था। गिरमिटिया मजदूर से लेकर सत्ता के शीर्ष तक का सफर तय करने वाला परिवार आज मॉरीशस का सबसे बड़ा राजनीतिक परिवार भी माना जाता है।

जानकारी के मुताबिक, प्रधानमंत्री प्रविंद अपने पुरखों की भूमि बलिया तो नहीं जा सके लेकिन वाराणसी में जनवरी 2019 में आठ दिवसीय दौरे पर भारत आए तो आयोजन के बाद भी वह काशी में ठहरे और विभिन्न मंदिरों में जाकर पूजा अर्चना इस भाव से किया कि कभी इन्हीं मंदिरों में उनके पुरखों ने आने वाली पीढ़ियों के लिए तमाम मन्नतें मांगी होंगी।

अभिलेखों में दर्ज दस्तावेजों के अनुसार 2 नवंबर, 1834 को भारतीय मजदूरों का पहला जत्था गन्ने की खेती के लिए कलकत्ता से एमवी एटलस जहाज पर सवार होकर मारीशस पहुंचा था। आज भी वहां हर साल दो नवंबर को ‘आप्रवासी दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। जिस स्थान पर भारतीयों का यह जत्था उतरा था वहां आज भी आप्रवासी घाट की वह सीढ़ियां स्मृति स्थल के तौर पर मौजूद हैं।

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